फ़क़ीर ने दुआ बरसाई, और वो रफ़ी बन गए

आवाज का एक जादूगर, जिसके गानों को पिछले सात दशकों से पूरा देश गुनगुना रहा है। एक आवाज जिसमे ख़ुशी और गम दोनों ने ही अपना ठिकाना बनाया। जिसे हिंदी सिनेमा का शहंशाह-ए-तरन्नुम कहा जाता है। ऐसे किसी शख्स के बारे मे सोचने पर एक ही नाम जुबाँ पर आता है- मोहम्मद रफ़ी। इन्हे देश-दुनिया में लोग रफ़ी साहब के नाम से भी जानते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में उन्हें सदी के श्रेष्ठ गायकों में शामिल किया गया है। उनकी मंझी हुई गायकी ने उन्हें एक ऐतिहासिक प्लेबैक सिंगर के रूप में स्थापित किया। अपनी अलहदा आवाज के चलते उन्होंने अपने समकालीन गायकों के बीच अपने आपको स्थापित किया। अपनी सादगी सरलता और विनम्रता के चलते वे हिंदी सिनेमा जगत में एक महान व्यक्तित्व के रूप में उभरे।

रफ़ी साहब का जन्म 24 दिसंबर 1924 में पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गाँव (अमृतसर) में हुआ था। जब वे सात साल के थे तभी उनका पूरा परिवार रोजगार के सिलसिले में लाहौर आ गया। उनके परिवार में कोई भी संगीत या गायन की पृष्ठभूमि से नहीं था। रफ़ी साहब के बड़े भाई की एक हज़ामत की दुकान थी। रफ़ी साहब अपना अधिकतमं समय यहीं पर गुजारते थे। दुकान के सामने से अक्सर एक फ़क़ीर गाते हुए गुजरता था। रफ़ी साहब को उनके गाने सुनना काफी अच्छा लगता था। वे भी फ़क़ीर के पीछे-पीछे चलने लगते थे। और उनके आवाज की नकल करने की कोशिश करते थे। संगीत के प्रति इसी मोह ने उनमे गायन के प्रति ललक पैदा कर दी। उनकी आवाज में इतनी निपुणता थी की लोग उनसे गाना गाने की फरमाइश करने लगे।

एक दिन उस फ़क़ीर ने भी उन्हें गाते सुना। उसने देखा कि जब नन्हे रफ़ी फकीरी गाते थे तो उनके दिल बंदगी का सैलाब आ जाता था। उन्हें सुनकर फ़क़ीर बहुत खुश हुआ, और फिर उस फ़क़ीर ने नन्हे रफ़ी को ये दुआ दी, “बेटा एक दिन तू बड़ा गायक बनेगा “। जो आगे चल कर सच साबित हुई।

संगीत में इनकी रूचि को देखकर बड़े भाई ने उस्ताद अब्दुल वाहिद खान से संगीत सीखने के लिए भेजा। 13 साल की उम्र में रफ़ी साहब ने अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन आल इंडिया रेडियो लाहौर में दिया था। प्रसिद्ध संगीतकार श्याम सुन्दर उनसे काफी प्रभावित हुए और उन्हें अपने लिए गाने हेतु निमंत्रित किया।

साल 1944 में आयी पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ के लिए उन्होंने पहला गीत गाया। फिर साल 1946 में रफ़ी साहब बम्बई आ गए। प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद साहब ने उन्हें फिल्म ‘पहले आप’ में गाने का अवसर दिया।

साल 1946 में आयी फिल्म ‘अनमोल घडी’ में ‘तेरा खिलौना टूटा’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा जगत में उन्हें ख्याति मिली। रफ़ी साहब के सादगी का पूरा बॉलीवुड कायल था। शराब, सिगरेट और पार्टियों से वे कोसों दूर थे। देश विभाजन के बाद उन्होंने भारत में ही रहने का निर्णय किया।

रफ़ी साहब ने तकरीबन 26,000 फ़िल्मी एवं गैर फ़िल्मी गानों में अपनी आवाज दी। उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी असमिया एवं तेलुगु भाषाओँ में भी अपनी प्रस्तुति दी।रफ़ी साहब ने सर्वश्रेष्ठ प्लेबैक सिंगर के क्षेत्र में कई बार फिल्मफेयर अवार्ड जीते। साल 1965 में भारत सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया।

31 जुलाई साल 1980 में पाक रमजान महीने की अलविदा के दिन रफ़ी साहब ने इस दुनिया को अलविदा कहा। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए हज़ारों लोगों की भीड़ सड़कों पर आ गई। उस दिन बांद्रा में पूरा ट्रैफिक जाम था। हर कौम के लोगों ने उन्हें कंधा दिया। माना जाता है कि मुंबई में इससे पहले कभी इतना बड़ा जनाजा नहीं देखा गया, जब पूरा शहर ही अंतिम यात्रा में शामिल हुआ हो। hairy woman


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