नवाजुद्दीन सिद्दीकी के काम से नारज थे पिता, घर आने से भी मना कर दिया

बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री के प्रसिद्ध अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी आज अपनी लगन एवं मेहनत के बूते अपनी नई पहचान बनायीं है। उन्होंने अपने अभिनय के दम पर लोगों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी है। आज वे जिस मुकाम पर हैं वहां पहुंचने के लिए लोग तरसते हैं। बॉलीवुड में उनके अभिनय ने कइयों के दिलों को जीता है। फिल्म जगत में कोई पारिवारिक पृष्ठ भूमि न होने के बावजूद उन्होंने इस इंडस्ट्री में अपना नाम कमाया। परन्तु ये सब इतना भी आसान नहीं था। इसके लिए उन्हें लम्बा संघर्ष करना पड़ा। लम्बा मतलब बहुत लम्बा। उन्हें तकरीबन 12 साल का लम्बा समय लगा इस फिल्म इंडस्ट्री में अपना पांव ज़माने के लिए। इस बीच उन्होंने कई छोटे रोले भी किये। उनमे से तो कई महज कुछ मिनटों के ही होते थे। आज भले ही वे बॉलीवुड के बड़े कलाकारों में गिने जाते हों, लेकिन एक वक़्त तब भी था जब उनका परिवार उनके छोटे रोल की वजह से शर्मिंदा हुआ करता था।

साल 1974 में जन्मे नवाजुद्दीन 9 भाई बहनों में सबसे बड़े थे। उनकाजन्म उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर के गांव बुढ़ाना में हुआ था। वैसे तो वे गरीब परिवार से तो नहीं थे , लेकिन उन्होंने परिवार से कोई आर्थिक मदद नहीं ली। इसलिए लिए उन्हें दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में रहने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। वक़्त तो सचमुच बुरा था पर इसी वक़्त ने उन्हें मजबूत बनाया।

फिल्मों में जाने के लिए उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, नई दिल्ली में दाखिला लिया। वहां उन्हें अपने खर्चों को चलाने के लिए चौकीदार तक की नौकरी करनी पड़ी लेकिन उन्होंने अपना धैर्य बनाये रखा।  दिल्ली में ही नवाज  साक्षी थियेटर से जुड़े। जहाँ पर उन्होंने सौरभ शुक्ला, मनोज वाजपेयी जैसे कलाकारों के साथ काम किया। इसके बाद उन्होंने सपनों की नगरी मुंबई का रुख किया। और यहीं से उनके संघर्षों का दौर शुरू हुआ।

शुरुवाती दिनों में उन्होंने देखा कि बाहरी रंगरूप एवं बनावट को फिल्मों में अधिक तवज्जो दी जाती है। सिर्फ हुनर देखकर कोई काम नहीं देना चाहता था। लिहाजा उन्हें हर जगह से रिजेक्शन का सामना करना। कुछ ही समय में उन्हें न सुनने की आदत सी हो गई। जहाँ भी शूटिंग चल रही होती वहां ऑडिशन देने पहुँच जाते थे। लेकिन कोई भी इन्हे एक एक्टर के रूप में काम देना नहीं चाहता था।

इसके बाद उन्होंने कई सारे छोटे छोटे रोल करना शुरू कर दिया। साल 1999 में आयी सरफ़रोश फिल्म में एक मुखबिर के किरदार के साथ  उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुवात की। इसी साल उन्हें शूल फिल्म में वेटर का किरदार निभाते दिखे।  उन्होंने टीवी धारावाहिकों में काम तलाशने की कोशिश भी की। लेकिन उसमे भी उन्हें कुछ खास सफलता नहीं मिली।

इतनी सारी असफलताओं के बाद किसी भी इंसान के धैर्य का बांध टूटने लगता है। नवाज़ भी अक्सर विचलित हो उठते थे।  कई बार मन में ख्याल आते थे की गांव लौट जाएँ। पर फिर सोचने लगते कि वे वहां पर जाकर करेंगे क्या, क्योंकि उन्हें तो सिर्फ फिल्मों में ही मजा आता है। वे कोई और काम नहीं कर सकते हैं। और फिर गांव के लोग क्या कहेंगे। दोस्त मजाक उड़ाएंगे कि हीरो बनने गया था, वापस आ गया। यही सब सोचकर वे वापस काम ढूढ़ने में लग जाते थे।

एक एंटरटेनमेंट वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि अक्सर जब उनके पिताजी उन्हें छोटे मोटे रोल करते देखते थे तो वे उन पर खूब गुस्सा होते थे। वे हमेशा कहते थे कि तुम छोटे रोल क्यों करते हो। मेरे पडोसी फिल्मों को देखकर मेरे पिताजी से कहते थे कि तुम्हारा लड़का पिट रहा है।  पिताजी निराश हो जाते थे। उन्हें लगता था कि मै असलियत में पिट रहा हूँ। उन्होंने मुझसे साफ साफ कह दिया था कि तुम्हे घर आने कि जरूरत नहीं है, तुम्हारे कारण हमें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है।

आखिरकार नवाज़ की किस्मत बदली। और उन्हें मौका मिला साल 2012 में आयी अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर भाग 2 में काम करने का। इस फिल्म में वे मुख्य भूमिका में दिखाई दिए। इस फिल्म ने उनके करियर को ही बदल कर रख दिया और वे आम से खास बन गए। इस फिल्म के रिलीज़ होने के बाद उन्होंने अपने पिता से पूछा कि उन्होंने गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर का पार्ट 2 देखा या नहीं। आपको बताते चलें कि फिल्म गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर के लिए इन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चूका है। इसके अलावा इन्हे ‘तलाश’, ‘कहानी’, ‘देख इंडियन सर्कस’ के लिए भी राष्ट्रीय पुरष्कारों से नवाज़ा गया है। बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री में इन्होने और भी कई सुपरहिट फ़िल्में दी हैं। इनमे से कई फिल्मों में उन्हें कई सारे अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं। микрозаймы онлайн


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