बिना सरकार की मदद के लोगों ने बनाया 1 करोड़ का पुल

अगर एक लकड़ी को हम तोड़ना चाहे तो आसानी से तोड़ सकते है, लेकिन जब लकड़ियों का गट्ठर हमें तोड़ना पड़े तो शायद हम नहीं तोड़ पाएंगे। अर्थात्, कुछ अच्छा करने के लिए एकता का होना बहुत जरूरी होता है। आज हम एकता से जुड़ी एक ऐसी ही वास्तविक कहानी के बारे में जानेंगे, जो भारत के असम राज्य से जुड़ी है।

हम अक्सर कहते हैं कि हमारे देश की सरकार निकम्मी है, वो जनता का ध्यान नहीं रखती। अनेक खामियां हैं इस सरकार में, भ्रष्ट और घोटालेबाज़ है। लेकिन क्या कभी हम ये सोचते हैं कि हम खुद कितने ईमानदार और सच्चे हैं? नहीं, क्योंकि हमारी आदत बन चुकी है दूसरों को नीचा दिखाना। हां मै मानता हूं कि कई बार सरकार अपने वादे पर खरा नहीं उतर पाती, लेकिन अगर इंसान अपनी एकता दिखाते हुए खुद की मदद करना शुरू कर दे, तो सरकार की जरूरत ही नही पड़ेगी। असम के कामरूप जिले के कुछ गांव के लोगों ने ऐसी ही एकता का परिचय दिया है।

गांव की परेशानी

हम अक्सर देखते हैं कि मानसून के समय में भारत के कई राज्य बाढ़ से जूझते हैं। नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है और कई दिनों तक एक गांव का दूसरे गांव से, या शहर से संपर्क टूट जाता है। नदियों पर बने पुल पानी के बहाव में बह जाते हैं। आजादी के इतने समय बाद आज भी देश में ऐसे कई गांव हैं जहां के लोगों को शहर जाने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है। लेकिन एक ऐसा रास्ता भी होता है जहां से शहर पहुंचने में कम समय लगता है। बस जरूरत होती है उन रास्तों पर सुविधा उपलब्ध होने की। उन रास्तों पर अनेक तरह की बाधाएं होती हैं, जैसे घना जंगल, दलदल, बहती हुई नदी, इत्यादि। ग्रामीणों का ऐसा कहना होता है कि, अगर इस नदी पर पुल बना दिया जाए, तो गांव से शहर पहुंचने में बहुत कम समय लगेगा। इसके लिए वे लोग सरकार से मदद भी मांगते हैं, लेकिन जब मदद नहीं मिलती तो वह निराश होकर रह जाते हैं।

असम के कामरूप जिले में भी कुछ गांव ऐसे थे, जहां के लोगों को शहर जाने या फिर एक गांव से दूसरे गांव जाने के लिए नदी को पार करना पड़ता था। बच्चों को स्कूल जाने के लिए भी उसी नदी को पार करना पड़ता था। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि उस नदी को पार करने के लिए कोई पुल नहीं था। उस नदी को लोग तैरकर पार किया करते थे। कई लोग ऐसा करते हुए दुर्घटना का शिकार भी हो जाते थे। लोगों ने कई बार सरकार से गुहार लगाई कि उस नदी पर एक पुल का निर्माण कर दिया जाए। उनकी कोशिशों के बावजूद भी उन्हें सरकार से कोई मदद नहीं मिली। इसके बाद गांव के लोगों ने एक ऐसा कारनामा किया जो एकता का मिसाल बन गया।

लोगों ने मिलकर बनाया पुल

मजबूरी इंसान से सब कुछ करवा देती है। कभी-कभी इंसान मजबूरी वश वह काम भी करने के लिए तैयार हो जाता है, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं होगा। सरकार से मदद ना मिलने पर उस गांव के लोगों ने भी मजबुर होकर खुद ही उस नदी पर पुल बनाने का निर्णय लिया। पुल बनाने के लिए पैसों की जरूरत थी। इसके लिए गांव वालों ने चंदा इकट्ठा करना शुरू किया। दस गांवों के लगभग 7000 लोगों ने पैसा दिया।

इसके बाद गांव वालों ने मिलकर पुल बनाने में इस्तेमाल होने वाले सभी चीजों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। 335 मीटर लंबे पुल को बनाने में लगभग एक करोड़ रुपए खर्च हुए। बिना सरकार के मदद के बनने वाले इस पुल का सारा खर्चा गांव वालों ने मिलकर उठाया। इस पुल के बनने के बाद लोगों की परेशानियां खत्म हो गई। बच्चे आसानी से स्कूल जाने लगे। अब कोई दुर्घटना का शिकार नहीं होता। लोग आसानी से नदी को पार कर पाते हैं। अब लोग बिना किसी परेशानी का सामना किए एक गांव से दूसरे गांव चले जाते हैं। आज यह पुल अनेक गांव के लिए संपर्क का जरिया बन गया है।

ऐसा नहीं है कि असम में पहली बार लोगों ने बिना सरकार की मदद लिए ऐसा कारनामा किया हो। इससे पहले भी दिहामलाई इलाके में लोगों ने मिलकर गांव के लिए नदी पर पुल बनाया, बिना सरकार की मदद लिए। दिहामलाई इलाके का यह पुल एक साथ चार गावों को जोड़ता है। यहां के लोगों का यह मानना है कि जनता की जरूरतों को पूरा करना सरकार का फर्ज है, लेकिन अगर कोई काम हम खुद कर सकते हैं तो उसके लिए सरकार की मदद लेने की जरूरत नहीं है। देश में पुल बनाने का काम सरकार का है, लेकिन अगर हम लोग मिलकर पैसे इक्कठा करके खुद ही पुल बना सकते हैं, तो इसके लिए सरकार से मदद का इंतजार नहीं करना चाहिए।

प्रेरणा

शहरों में रहने वाले लोग अक्सर गांव और वहां रहने वाले लोगों को कमजोर और अशिक्षित समझ लेते हैं, लेकिन शायद वो भूल जाते हैं, की जिन घरों में वो रहते हैं, जिस सड़क पर वो चलते हैं, उसे किसी गांव या किसी अशिक्षित मजदूर ने ही बनाया हैं। आज के समय में किसी को कमजोर समझना बहुत बड़ी गलती हैं। असम के इस गांव के लोगों ने मिलकर पुल बनाया और एकता का परिचय भी दिया। आज ये लोग पूरे देश के लिए एक मिसाल हैं।

असम के इस छोटे से गांव के लोगों की यह कहानी अगर आपको पसंद आई, तो इसे दूसरे लोगों को भी सुनाए। गावों से निकलकर आने वाली ऐसी ही प्रेरणा भरी कहानियों को जानने के लिए बने रहे हमारे साथ, और टिप्पणी करके जरूर बताएं कि आपको किसी गांव की कौन सी कहानी याद आती है। займ онлайн


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