1 रु. में भूख मिटाती हैं, इडली वाली 85 वर्षीय दादी

भूख भी कैसी अजब चीज़ है। कोई भूख बढ़ाने के नुस्खे खोज रहा है। रात का ठूँसा पचाने के लिए तड़के सुबह से सड़कों पर दौड़ रहा है। तो कोई ऐसा भी है जो भूख की वजह से दम तोड़ रहा है।  वो भी ऐसे देश में जहाँ वन्देभारत और राजधानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें फर्राटे मारती है। जहाँ के वायुयानों की पहुँच दुनिया के तकरीबन हर कोने तक है। आज उस देश में हर चौथा आदमी भूखा सोता है।

कोरोना महामारी के कारण समूचा देश पिछले डेढ़ माह से भी अधिक समय से लॉक डाउन में है। जिसमे हमें अलग-अलग तरह की ख़बरें देखने-सुनने में आ रही हैं। मसलन महगाई मुँह बाये खड़ी है। देश की अर्थव्यवस्था खस्तेहाल में है। महामंदी आने वाली है वगैरह-वगैरह। इस लॉक डाउन  ने तो सर्वहारा वर्ग की तो कमर ही तोड़ रख दी है। तथाकथित अमीरों के लिए पनाहगाह बनाने वाले आज अपने पनाहगाह तक पहुँचने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। महानगरों की भूख मिटाने के लिए रात-दिन जी-तोड़ मेहनत करने वाले आज खुद भूख से बिलबिला रहे हैं। आज उनकी ऑंखें टकटकी लगाए किसी के मददगार की तलाश में हैं।

आज प्रवासी मजदूरों को उनके दो वक़्त के खाने का इंतज़ाम कर पाना किसी मुसीबत से कम नहीं है। ऐसे में इन बेसहारों की मदद के लिए कई हाथ आगे आये हैं। कोई इन्हे मुफ्त राशन बाँट रहा है। तो कोई इन्हे मुफ्त में खाना खिला रहा है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी को हम आप तक लेकर आये हैं। तो चलिए शुरू करते हैं।

तो बात है कोयंबटूर की। यहाँ तकरीबन 85 वर्षीया एक दादी हैं, कमलाथल जो इस लॉकडाउन में लोगों की मदद करने के लिए मात्र 1 रु में इडली खिला रही हैं। कमलाथल पिछले तीस सालों से लोगों को सांभर चटनी के साथ इडली खिला रहीं हैं। कमलाथल को लोग इडली वाली अम्मा के नाम से जानते हैं।

कोयम्टूर से लगभग 20 किमी दूर पेरूर के पास एक गाँव है, वेदिवेलमपलायम। कमलाथल इसी गाँव में रहती हैं। लॉक डाउन के इस दौर में भी वे इडली का दाम बढ़ाना नहीं चाहती। मीडिया को उन्होंने बताया “कोरोना के चलते हालात काफी मुश्किलों से भरा है। मेरी पूरी कोशिश है कि मै इडली का दाम 1 रु ही रखूं। कई मज़दूर फंसे हैं। काफी लोग आते जा रहे हैं। कई लोग उनकी मदद कर रहे हैं। मै भी 1 रु में इडली खिलाकर इन सबकी मदद करुँगी।“

कमलाथल बताती हैं कि वे यह काम मुनाफा कमाने के लिए नहीं बल्कि लोगों की मदद करने के लिए करती हैं। वे इडली को 1 रु। में इसलिए बनाकर बेचती हैं ताकि गरीब मजदूर और उनके परिवार इसे आसानी से खरीद सकें। दादी दिन के 1000 से भी अधिक इडली बनाती हैं। आप सब को यह बात जानकर हैरानी होगी कि इस उम्र में भी सारा काम दादी खुद अपने ही हाथों से करती हैं।

वैसे ये कोई पहली बार नहीं है जब कमलाथल अम्मा चर्चा में आयी हों। इससे पहले भी कई बार वे सुर्ख़ियों में रही हैं। मसलन पिछले साल ही देश के जाने माने उद्दोगपति आनद महिंद्रा जी के ट्वीट के जरिये वे राष्ट्रीय स्तर खबरों में छाई रही।

आनद महिंद्रा ने अपने ट्विटर हैंडल से उनकी कहानी को शेयर किया था। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा था-

“यह उन  विनम्र कहानियों में से है जो आपको चकित कर देती हैं। आप अगर कमलाथल जैसे लोगों की तरह काम करते हैं तो यह लोगों को प्रभावित करता है। मझे लगता है कि वे अभी भी लकड़ी के चूल्हे का इस्तेमाल करती हैं। मुझे उनके व्यवसाय में निवेश करने से खुशी होगी। मै उनको एलपीजी ईंधन वाला चूल्हा खरीदकर देना चाहता हूँ।”

आनंद महिंद्रा जी के ट्वीट के बाद कमलाथल कि यह स्टोरी वायरल हो गयी। गहरे होते होते यह ट्वीट पेट्रोलियम मंत्रालय तक पहुंच गया। इसके बाद तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्वयं हस्तक्षेप किया। और इसके बाद भारत गैस कोयंबटूर ने उन्हें गैस कनेक्शन मुहैया कराया।

आनंद महिंद्रा ने भारत गैस का धन्यवाद किया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा – “मै पहले ही बता चूका हूँ कि एलपीजी की लागत वहन करने में मुझे ख़ुशी होगी। प्रधान उसके प्रति सहानुभूति दिखाने के लिए आपका धन्यवाद।”  धर्मेंद्र प्रधान ने ट्वीट किया कि- “कमलाथल की लग्न और प्रतिबद्धता को सलाम। स्थानीय अधिकारीयों के माध्यम से उन्हें गैस कनेक्शन दिलवाने में मदद करने से ख़ुशी हुई। समाज को ऐसे मेहनती लोगों को सशक्त बनाना चाहिए।”

कमलाथल बताती हैं की उनका लक्ष्य लोगो को भरपेट और सस्ता खाना खिलाना है। पिछले तीन दशकों से अपने लक्ष्य को साथ लेकर वे आज भी यह काम उतने ही लगन एवं समर्पण से करती हैं। कमलाथल आज भी इडली बनाने के लिए अपने पुराने पत्थर के सिलबट्टे का ही उपयोग करती हैं। पहले उनके पास स्टोव नहीं बल्कि एक पुराने ज़माने की भट्ठी हुआ करती थी। कमलाथल की इडली का स्वाद चखने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। займы на карту срочно


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