बेटे को चुभा कांच, तो पहाड़ को साफ कर बना डाली 20 डस्टबिन

नमस्कार दोस्तो आपका स्वागत है। आपने वो कहावत तो सुनी होगी कि “हौसला हो तो आप किसी भी बुलंदी को पा सकते हैं” इसी कहावत को सच कर दिखाने वाले एक इंसान के बारे में आज बताने जा रहे हैं जिसने अपने हौसले से न केवल बुलंदियों को पा लिया साथ ही साथ समाज के सामने एक मिसाल बनकर सामने आया है। तो आइए जानते है उस महान व्यक्तित्व के बारे में।

झारखंड सरकार में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी के बेटे के पांव में शीशा क्या चुभा उसने पूरे पहाड़ को ही साफ-सुथरा करने की जिद ठान ली। उसने टूटे फूटे काँच के टुकड़ों की मदद से बहुत सारे डस्टबिन बना डाले। इसके साथ उन्होंने लोगो से इसका इस्तेमाल करने की अपील भी की। उनके इस महत्वपूर्ण कदम से एक समय जिस पार्क में चारो तरफ कभी कचरा हुआ करता था, वो आज साफ सुथरा और सुंदर बन गया है।

तो आपकी उत्सुकता को कम करते हुए हम आपको मिलाते हैं देवघर में विशेष भू -अर्जन मध्यम सिंचाई विभाग में प्रोसेस प्यून पद पर तैनात जीतेंद्र महतो से, जो पहले रोज सुबह उठकर शहर से 2 किलोमीटर दूर टहलने के लिए नंदन पर्वत पर जाते थे। एक दिन उनके साथ उनके बेटे संजय कुमार ने भी टहलने के लिए साथ जाने की ज़िद पकड़ ली। बेटे की ज़िद और उत्साह को देखते हुए जितेंद्र ने उसे भी अपने साथ ले लिया। उन्होंने अपने बेटे को ध्यान से खेलने को कहा ताकि उसके पैर में कांच न लग जाये। तभी अचानक जितेंद्र को अपने बेटे के पैर से खून बहता हुआ दिखाई दिया और उन्हें समझने में देर न लगी कि मेरे बेटे के पैर में कांच के टुकड़ा चुभ गया है।

इसके बाद जितेंद्र ने बिना समय गवाएं अपने बेटे को लेकर घर की ओर बढ़ चले। रास्ते मे उनके बेटे ने उनसे सवाल किया कि, “पिताजी, लोग रास्ते मे कांच के टुकड़े क्यों फेकते हैं” तो उस समय जितेंद्र ने बेटे को चुप करा कर घर जाने की नसीहत दी। लेकिन एक दिन एकांत में बैठे हुए उन्हें अपने बेटे की बात याद आने लगी और उन्होंने उस जगह की सफाई करने का निर्णय लिया। शुरुआत में उन्होंने उसी जगह की सफाई की जहाँ पर उनका रोज का बैठना हुआ करता था। गंदगी का अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि महज 10 फ़ीट की जमीन को साफ करने में 3 दिन का समय लग गया।

शुरू में शर्म लगी, लोगो ने भी टोका

जितेंद्र को शुरुआत में सफाई का काम करते वक़्त शर्म भी आती थी। बहुत सारे लोग उनका मजाक बनाते और उन्हें टोकते भी थे। लोग उनसे कहा करते थे कि आप इतना मेहनत क्यों करते हो। उन्होंने हमें बताया कि, ” इसके बाद मुझे नंदन पर्वत पर स्थित पार्क के बारे में पता चला और जब मैंने वहा जाकर देखा तो पाया कि हर तरफ गंदगी फैली थी और जगह जगह कांच के टुकड़े भी फैले थे। इस देख कर मैन उसे साफ करने का निर्णय किया और मुझे जब भी समय मिलता है मैं उसे साफ करने के लिए चले जाता हूँ।”

सालभर में बना दिये 20 डस्टबीन

जितेंद्र ने कहा, ” मैन केवल एक साल में इस पार्क की सफाई की और साफ सुथरा बना दिया। लॉकडाउन के कारण मुझे बीच मे काम को रोकना पड़ा। लेकिन फिर से मैने सफाई का काम शुरू कर दिया है। मैंने वहाँ पर पड़े हुए छोटे छोटे कांच के टुकड़े को बीनकर उसमे बालू और सीमेंट मिलाकर साल भर में लगभग 20 डस्टबिन बना लिए और मैं हमेशा लोगो से अपील करता हु कि वो इस डस्टबिन का उपयोग करें।”

सफाई के लिए भी लेनी पड़ी इजाजत

नंदन पर्वत स्थित पार्क को साफ करने में भी जितेंद्र को बहुत समस्याओ का सामना करना पड़ा। पार्क के मैनेजर से उनकी बहस हो गयी। जितेंद्र का कहना है, ” मैं पार्क में बिखरे कांच के छोटे छोटे टुकड़े को इकठ्ठा कर रहा था और वही दूसरी ओर मुझपर कांच को इधर उधर फेकने का आरोप लगाया गया। बहस के बाद मेरा काम भी रुक गया। मैंने इसके बाद संबंधित अधिकारियों से मिलकर उनसे बात की। उन्होंने मुझे बताया कि जब बोर्ड की बैठक होगी तो इसके ऊपर चर्चा की जाएगी। कुछ दिनों बाद मुझे काम करने की इजाज़त मिल गयी।”

पूरे नंदन पर्वत को साफ करने का है सपना

जितेंद्र का सपना और हौसला नंदन पर्वत के ही समान ऊँचा और दृढ़ है। उन्होंने 2 किलोमीटर के दायरे में फैले इस पर्वत को साफ सुथरा करने का सपना देखा है। जितेंद्र ने बताया कि, “इस पहाड़ पर घूमने फिरने के लिए आसपास के इलाके से करीब 500 लोग आते हैं। शुरुआत में ये लोग मुझे यहाँ का स्टाफ समझते थे जो यहाँ पर सफाई का काम करता है। लेकिन जैसे जैसे इनको मेरे बारे में पता चला वो भी मेरा साथ देने के लिए आगे आये हैं जिससे मेरा हौसला और उम्मीद और भी मजबूत हो गयी है। मैं एक दिन एक पूरे पर्वत को साफ सुथरा जरूर बनाऊंगा।”

तालाब के किनारे की भी सफाई का जिम्मा संभाला

नंदन पर्वत के किनारे एक बड़ा सा तालाब है जिससे पूरे शहर को पानी की सप्लाई होती है। दिसंबर और जनवरी के महीने में लोग पार्टी करने के लिए इसके किनारो पर आते हैं। और बहुत सारी गंदगी छोड़ जाते हैं। इससे तालाब के किनारो पर बहुत अधिक गंदगी जमा हो जाती है। जितेंद्र ने यहां पर भी सफाई करने का निर्णय लिया है। वो जनवरी और फरवरी में इस तालाब के किनारो की सफाई करते हैं और इसके लिए महीने का 15 दिन उसी सफाई के काम मे लगाते हैं।

सफाई के साथ ही वृक्षारोपण का भी है शौक

जितेंद्र को साफ सफाई के साथ पौधे लगाने का भी शौक है। उन्होंने बताया कि, ” देवघर में मैंने इस साल करीब 70 पौधे लगाए हैं। 220 के आसपास और पौधे लगाने हैं। मुझे जहाँ कही खाली जगह दिखाई देती है मैं वहाँ पौधे लगा देता हूँ। अभी तक मैं एक हज़ार से अधिक पौधे लगा चुका हूँ।”

जितेंद्र का मानना है कि हर धर्म के इंसान का अंतिम साथी पौधा ही है। लोगो को अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना चाहिए। साथ ही अपने आसपास की सफाई भी करनी चाहिए। यही आप भी जितेंद्र की इस मुहिम में अपना योगदान देना चाहते हैं तो उनसे 7488349671 पर संपर्क कर सकते हैं।

तो इस आर्टिकल में हमने आपको एक इंसान के हौसले और जज़्बे की कहानी बताई है। आपको यह आर्टिकल कैसा लगा आप मुझे नीचे कमेंट करके बता सकते हैं। और भी मजेदार आर्टिकल पढ़ने के लिए K4 Feed को फॉलो कीजिये।

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