पुस्तक: उपनिवेशवाद और आदिवासी संघर्ष
लेखक: हैरोल्ड एस तोपनो
प्रकाशन: विकल्प प्रकाशन
एक नजर आदिवासियों के संघर्ष पर
पुस्तक उपनिवेशवाद और आदिवासी संघर्ष के लेखक का नाम हैरोल्ड एस तोपनो है जिन्हें लोग सामू के नाम से भी जानते हैं. हेरोल्ड एस तोपनो आदिवासी की जिंदगी,तकलीफ, संघर्षों का चित्रण और उनके अधिकारों की बात करते हैं. उनकी पुस्तक उपनिवेशवाद और आदिवासी संघर्ष आलेखों का संग्रह है.इन आलेखों की रचना उन्होंने बिहार के पुराने अखबार के कॉलम के लिए की थी. इस कॉलम का नाम “जंगल गाथा” था उन्होंने यह संग्रह इसी कॉलम के लिए लिखे थे.
इस कॉलम की शुरुआत “झारखंड आंदोलन” की आवाज उठाने के लिए हुई थी. इस कॉलम के जरिए उन्होंने झारखंड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों में रहने वाले आदिवासियों के जीवन और उनके संघर्षों पर लोगों का ध्यान एकत्रित करने के लिए किया,जिससे लोगों को यह और अच्छे से समझ में आए कि आदिवासी समुदाय के लोग किन कठिनाई और समस्याओं से गुजर रहे हैं.
इन लेखों को लिखे हुए तकरीबन दो दशक से अधिक बीत चुके हैं लेकिन इसके बावजूद भी यह उतना सफल नहीं हो सका जितना लेखक ने सोचा था. मीडिया पर भी एक-दो खबरों के अलावा ज्यादा नहीं दिखाया गया. आदिवासी समुदाय लगातार हाशिए की तरफ बढ़ते जा रहे हैं आने वाले दशकों में ऐसा संभव है कि आदिवासी समुदाय पूरी तरह से लुप्त हो जाएं.लेखक इन्हीं समुदाय को लेकर चिंता जता रहे हैं पर परिस्थितियों में ज्यादा सुधार नजर नहीं आ रहे.
उपनिवेशवाद और आदिवासी संघर्ष पुस्तक में तकरीबन 30 लेख है.यह लेख दुनिया भर में मौजूद आदिवासियों की जीवन गाथा सुना रहे हैं कि वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं,कितने संघर्षों के साथ वह दो वक्त की रोटी जुटा रहे हैं. सभ्य समाज यानी हम जैसे लोग उन्हें असभ्य मानते हैं हम उन्हें अपने से अलग मानते है, लेकिन यह बस हमारी गलत सोच है. सरकार जंगलों के विकास के नाम पर उन्हें उनके घर से बेदखल कर रही है और उन्हें उनका घर छोड़ने पर मजबूर कर रही है ना जाने कितने तो आदिवासी समूह लुप्त भी हो चुके हैं और जो कुछ बाकी है अगर ऐसा ही रहा तो वह भी जल्द ही लुप्त हो जाएंगे.
सामू ने अपने लेखों में देश के विकास के लिए बांधों को बनाया जा रहा है उनके कारण आदिवासियों को जो विस्थापन सहना पड़ रहा है उसका भी उल्लेख अपने लेखों में किया है. लेखक का मानना है कि उपनिवेशवाद की धारणा केवल और केवल एक लुटेरी और हत्यारी धारणा है जो आदिवासी समुदाय को अपनी ही जमीन पर शरणार्थी बनाती जा रही है.
इन लेखों में गंभीर मुद्दों पर बातचीत की गई है और इन लेखों को लिखने में सामू ने साधारण भाषा का प्रयोग किया है जिसके कारण वह अपने विचारों को दूसरे तक आसानी से पहुंचा पा रहे हैं इस किताब को आपको अवश्यक ही पढ़ना चाहिए इसमें आपको कई आदिवासी वीरों की जीवन गाथा और उनके कामों के बारे में भी जानने को मिलेगा.


