जब हजरत मूसा ने गड़रिए से जाना सच्ची इबादत का अर्थ

इबादत, प्रार्थना, मन्नत, ये तमाम ऐसे शब्द हैं जिन्हें हम तभी इस्तेमाल करते हैं, जब हमें मदद की जरूरत होती है और मददगार के रूप में हमें सिर्फ ईश्वर ही दिखाई देते हैं। इंसानों में एक भावना ऐसी होती है, जो शायद सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही दिखाई देती है। वह भावना है प्रार्थना करने की। जब हमें मदद की जरूरत होती है, तब हम भगवान या किसी इंसान के सामने हाथ जोड़े खड़े हो जाते हैं। जब हमारी जरूरत पूरी हो जाती है तो हम सामने वाले को पहचानना बंद कर देते हैं।

कहते हैं कि अगर सच्चे मन से चाहो तो भगवान भी मिल जाते हैं। अब इस बात में कितनी सच्चाई है इसका तो पता नहीं, लेकिन अगर मन सच्चा हो तो किस्मत के साथ- साथ कोई इंसान भी मदद करने को तैयार हो जाता है। अब अगर प्रार्थना और भगवान की बात आ ही गई है तो इससे संबंधित एक कहानी भी सुनते है, जिसमें मूसा और एक भोले भाले गड़रिया का जिक्र है।

जब मूसा ने गड़रिया को प्रार्थना करना सिखाया

एक बार जब मूसा एक जंगल से गुज़र रहे थे, तब उन्हें प्रार्थना करता हुआ एक गड़रिया दिखाई दिया। वह भगवान से अनोखे तरीके से प्रार्थना करते हुए कह रहा था कि ऐ खुदा, अगर मुझे तेरा दीदार हो जाए तो मै तेरी खूब सेवा करूंगा, तेरी मालिश करूंगा, तुझे नहलाऊंगा और बीमार पड़ने पर तेरी दवा-दारू भी करूंगा। मै जिंदगीभर तेरा गुलाम बन कर रहुंगा और तेरे लिए अपनी जान भी कुर्बान कर दूंगा। इस तरह की प्रार्थना देखकर मूसा आश्चर्यचकित रह गए।

उन्होंने गड़रिया से कहा कि भगवान इस तरह प्रार्थना करने से खुश नहीं होते। भगवान को किसी की क्या जरूरत। वह तो सर्वोपरि हैं। वह कभी बीमार नहीं पड़ता और उसे किसी की जरूरत नहीं होती। गड़रिया यह सुनकर चुप हो गया और उसने मूसा से क्षमा मांगी। इबादत करने की सही विधि जानकार वह अपने घर चला आया।

उसी रात जब मूसा ईश्वर की अराधना कर रहे थे, तो उन्हें एक आवाज सुनाई दी। वह आवाज शायद ईश्वर की थी। ईश्वर ने कहा कि तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी है। गडरिया सच्चे मन से मेरी अराधना करता था और अपने आप को मेरे सामने पूरी तरह खोल कर रख देता था। तूने उसे इबादत की विधि बताकर उसे मुझसे दूर कर दिया। इसकी सजा तुझे भुगतनी पड़ेगी। मूसा को अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने तुरंत ईश्वर से क्षमा मांगी।

सीख

हम अक्सर भगवान की आराधना करने के लिए तरह-तरह के तरीके अपनाते हैं। इसके लिए कभी-कभी हम ढोंगी पंडितों के बहकावे में भी आ जाते हैं, लेकिन सही मायने में ईश्वर की आराधना करना वही होता है जिसमें हम निस्वार्थ भाव से गरीबों की सेवा करें और अपना कार्य ईमानदारी से करें। याद रखें, सही मायने में कर्म ही पूजा होता है। срочный займ на карту онлайн


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