जानिये कैसे हुई ‘जोमैटो’ की शुरूआत

हम हिन्दुस्तानियों में एक ख़ास बात होती है। हम अपने प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। कभी किसी से लड़ जाते है, तो कभी रूठ जाते है, कभी हर बात सच-सच कह देते है, तो कभी अपनों से झूठ भी बोल देते हैं। हम अक्सर ये देखते हैं कि एक औरत अपने बेटे के लिए ऐसी बहू चाहती है, जो हर काम में माहिर हो। चाहे वो संगीत हो, शिक्षा हो, खेल कूद हो या फिर रसोई के काम हो। इसके लिए वो कभी-कभी अपने बेटे की प्रेमिका की परीक्षा भी लेती है, और कोई पकवान बनाने के लिए कह देती हैं। जब उस लड़की को रसोई के काम करना नहीं आता, तो वह अपने प्यार को पाने के लिए बाहर से वही पकवान मंगवाती है, और सबसे यह कह देती है कि वो पकवान उसी ने बनाया है। और इस तरह वो रसोई के इस इम्तिहान में सफल हो जाती हैं।

यह एक प्यारा सा झूठ जरूर है, लेकिन कुछ सालो पहले तक किसी ने ऐसा झूठ बोलने के बारे ने नहीं सोचा होगा। क्योंकि पहले शायद कोई ऐसा साधन नहीं था, जिससे घर बैठे बाहर से खाना मंगवा लिया जाए। लेकिन पंजाब में जन्मे ‘जोमैटो’ के संस्थापक दीपेंद्र गोयल और उनके सहकर्मी पंकज चड्ढा ने यह मुमकिन कर दिखाया। अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘टोमैटो’ यानी टमाटर से मिलते जुलते इस शब्द के पीछे भी एक कहानी है, लेकिन उससे पहले आइए जानते हैं दीपेंद्र गोयल, पंकज चड्ढा और उनके एक अनोखे शुरुआत की कहानी।

दीपेंद्र गोयल एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं। उनके माता और पिता दोनों शिक्षक हैं लेकिन इसके बावजूद भी दीपेंद्र गोयल पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं थे। आठवीं कक्षा तक शिक्षक के बताए हुए प्रश्न और उत्तर की वजह से वह पास हुए और कक्षा दसवीं में अच्छे अंक लाने की वजह से उनका नामांकन चंडीगढ़ के डीएवी स्कूल में हुआ। लेकिन यहां भी वह एक बार फेल हो गए। इसके बाद उन्होंने जैसे-तैसे अपने आप को संभाला और कक्षा 12वीं पास करने के बाद ‘आईआईटी दिल्ली’ में प्रवेश ले लिया। यहां से उन्होंने ‘मैथ एंड कंप्यूटिंग’ में मास्टर की डिग्री हासिल की और उसके बाद उन्हें एक कंपनी में नौकरी मिल गई।

एक नई शुरुआत

अच्छी नौकरी मिलने के बाद भी दीपेंद्र संतुष्ट नहीं थे। उनका दिमाग हमेशा बिजनेस के बारे में सोचता रहता था। एक दिन दीपेंद्र खाना खाने अपने ऑफिस के कैफेटेरिया में पहुंचे। वहां लगी भीड़ को देखकर वह परेशान हो गए, लेकिन अचानक उन्हें इसी भीड़ से बिजनेस करने की तरकीब सूझी। वहां उन्होंने देखा कि ऑफिस के कैफेटेरिया में उपलब्ध खाने की वस्तुओं के बारे में जानने के लिए ऑफिस के सभी कर्मियों को लंबी कतार में खड़े रहना पड़ता है।

इस परेशानी को सुलझाने के लिए दीपेंद्र ने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने का मन बनाया। उन्होंने खाने की सूची की तस्वीर लेकर इंटरनेट पर एक वेबसाइट बनाया और वहां उस सूची को लगा दिया। इंटरनेट पर उपलब्ध होने की वजह से लोगों को सहूलियत होने लगी और लंबी कतार में खड़े रहने से मुक्ति मिल गई। साथ ही उस तस्वीर पर अनेक लोगों ने टिप्पणी भी की और उसे पसंद भी किया।

यहां से दीपेंद्र ने मन बना लिया कि अब इस काम को आगे तक ले कर जाना है। उन्होंने एक ऐसा वेबसाइट बनाने के बारे में सोचा, जिसमें दिल्ली शहर के सारे होटल और रेस्टोरेंट हो, और वहां पर उपलब्ध होने वाले खाने पीने की चीजों की जानकारी मिल सके। अपने दोस्त प्रसूत जैन के साथ मिलकर उन्होंने दिल्ली शहर के लिए ‘फुडलेट’ के नाम से एक काम शुरू किया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद प्रसूत मुंबई चले गए और दीपेंद्र अकेले पड़ गए। ऐसी स्थिति में उनके सहयोगी के रूप में पंकज चड्ढा सामने आए, जो दीपेंद्र की कंपनी में ही उनके सहकर्मी थे। दोनों ने मिलकर इंटरनेट पर ‘foodiebay.com’ के नाम से एक वेबसाइट बनाया, जिसमें ग्राहकों को उनके स्तिथि, उपलब्धता और कीमत के हिसाब से अच्छे होटलों की जानकारी मिल सकती थी। प्रारंभ में इस में दिल्ली के एक हजार से ज्यादा होटल और रेस्टोरेंट को जोड़ा गया।

साल 2008 के अंत तक ‘foodiebay.com’ में दिल्ली के दो हजार होटल जुड़ गए, और यह दिल्ली कि सबसे बड़ी वेबसाइट बन गई, जिसमें सभी होटलों को जानकारियां उपलब्ध हो। 2009 आते-आते दिल्ली के अलावा मुंबई और कोलकाता और 2010 तक पुणे और बंगलुरू में भी ‘foodiebay.com’ का विस्तार हो गया।

अब दीपेंद्र ‘foodiebay.com’ को बड़े स्तर पर ले जाने के बारे में सोचने लगे। लेकिन इसके लिए पूरा ध्यान बिजनेस की तरफ़ होना आवश्यक था। साथ ही कंपनी में निवेश की भी आवश्यकता महसूस की जाने लगी। नौकरी के साथ अपने शुरू किए हुए बिजनेस को पूरा समय और ध्यान दे पाना संभव नहीं था। इसी दौरान दीपेंद्र की पत्नि को ‘दिल्ली यूनिवर्सिटी’ में प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। पत्नि से मानसिक और आर्थिक दोनों संबल मिलने पर दीपेंद्र ने अपनी नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से बिज़नस की ओर ध्यान देने लगे।

‘Foodiebay.com’ का नया नामकरण

प्रसिद्धि हासिल करने के लिए एक अच्छे नाम की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। कई बार ऐसा होता है कि कुछ नाम ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पाते, इस वजह से किसी वस्तु कि ज्यादा बिक्री नहीं हो पाती। दीपेंद्र की कंपनी के साथ भी ऐसा ही था। उन्हें लगा कि ‘foodiebay.com’ नाम ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पाएगी। साथ ही ये नाम, एक दूसरी कंपनी ‘ebay’ के नाम से मिलता जुलता भी था।

दीपेंद्र और पंकज अपनी कंपनी के नाम को लेकर किसी असमंजस की स्तिथि नहीं चाहते थे। साथ ही वो एक ऐसा नाम भी चाहते थे, जो रसोई के काम से या उनमें इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं से मिलता जुलता हो। यहीं से यह नाम आया ‘जोमैटो’। यह नाम ग्राहकों को आकर्षित करने लायक था, क्योंकि लोगों ने ‘टोमैटो’ यानी टमाटर के बारे में सुना था, और जब इससे मिलता जुलता शब्द ‘जोमैटो’ आया तो लोगों का ध्यान इसके तरफ आकर्षित होने लगा। और इस तरह शुरू हुई हम सबकी पसंदीदा ‘जोमैटो’ कंपनी।

आज के समय में ऐसी अनेक विदेशी कंपनियां है, जो भारत में आकर अपना काम कर रही है, और मुनाफा भी कमा रही हैं। ऐसी प्रतिस्पर्धा वाली दुनिया में ‘जोमैटो’ एक ऐसी भारतीय कंपनी है, जो आज के समय में अनेक विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। घर-घर खाना पहुंचाने वाली इस कंपनी ने आज कई लोगो को रोजगार भी उपलब्ध कराया हैं।

किसी भी कंपनी को अपना विस्तार करने के लिए निवेशकों को आवश्कता होती हैं। आज ‘जोमैटो’ के पास भी ‘Sequoia Capital, Naukari.com, Temasek, Alibaba’s Ant financial जैसी प्रमुख कंपनियां है, जिन्होंने ‘जोमैटो’ में अरबों रुपए का निवेश किया है। भारतीय कंपनी होने के बाद भी आज ‘जोमैटो’ का विस्तार देश के साथ साथ विदेशो में भी हुआ है। यूनाइटेड किंगडम, श्रीलंका, कतर, फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका, टर्की, ब्राजील जैसे अनेक देश है, जहां हमारी घर की इस कंपनी ने सफलता के झंडे गाड़े है।

‘जोमैटो मोबाइल ऐप’

किसी भी बिजनेस के विकास के लिए ‘मोबाइल ऐप’ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दीपेंद्र और पंकज भी इस बात को समझ चुके थे। अपने कंपनी के विकास के लिए उन्होंने भी एक ‘मोबाइल ऐप’ शुरू किया, जिसकी वजह से उनकी कंपनी दुगने रफ्तार से तरक्की करने लगी।

आज हम अपने घरों में बैठे रहते है, और जब अचानक कुछ खाने का दिल करता है तो हमारा ध्यान ‘जोमैटो’ के तरफ ही जाता है। मध्यमवर्गीय परिवार और पढ़ाई के प्रति गंभीर ना रहने के बावजूद दीपेंद्र ने अपने आत्मविश्वास के बल पर इतनी बड़ी कंपनी शुरू कर दी। आज यह कंपनी हमें घर बैठे खाना उपलब्ध तो करवाती ही है, साथ ही कई लोगों को रोजगार देकर उनकी रोजी रोटी की व्यवस्था भी करती है।

तो ये थी हम सबकी पसंदीदा ‘जोमैटो’ के उदय और सफलता की कहानी। भारतीय उद्योग जगत से जुड़ी ऐसी ही दिलचस्प कहानियों को जानने के लिए बने रहे हमारे साथ। और टिप्पणी करके जरूर बताएं, कि आप ‘जोमैटो’ की सुविधा का लाभ कब से उठा रहे हैं। unshaven girl


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