पारंपरिक खेती छोड़, बागवानी खेती अपनाएं और लाखों कमाए!

भारत हमेशा से कृषि प्रधान देश रहा है और आज भी 21वीं सदी में जब पूरी दुनिया ग्लोबलाइजेशन से आर्थिक सफलता प्राप्त कर रही है, वहीं भारत ने कृषि उद्योग को ग्लोबल बनाने का निश्चय किया है। भारत सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में निवेश करना तथा वैज्ञानिकों को नई-नई टेक्नोलॉजी तथा रिसर्च के लिए प्रोत्साहन देना एक सराहनीय काम है। निवेश के साथ-साथ सरकार ने अनको प्रशिक्षण केंद्र खोले हैं जहां किसान आधुनिक खेती के बारे में जान सकता और उसका प्रयोग करके अपनी आमदनी बढ़ा सकता है।

1960 में ग्रीन रिवॉल्यूशन आने के बाद किसानों की आमदनी तथा उत्पाद में बढ़ोतरी देखने को मिली थी, परंतु 90 का दशक अंत होने तक, पारंपरिक खेती के द्वारा किसानों को घाटा होने लगा था। किसान खेती छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहा था, परंतु किसानों को खेती की तरफ फिर से अग्रसर करने के लिए तथा उनकी आमदनी बढ़ाने के लिए पारंपरिक खेती से हटकर किसानों को बागवानी खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विज्ञान और आधुनिक टेक्नोलॉजी की मदद से और सीमित संसाधनों के साथ बागवानी खेती तथा नर्सरी किसानों के लिए लाभदायक साबित हो रही है।

आज का यह आर्टिकल किसान भाइयों के लिए है, जिसमें हम बताएंगे कि बागवानी खेती तथा नर्सरी से कैसे हमारे किसान भाई अपनी आए में बढ़ोतरी कर सकते हैं और अंत में हम कुछ किसानों का उदाहरण देखेंगे जिन्होंने बागवानी खेती कर सालाना लाखों रुपए कमा रहे हैं।

बागवानी खेती

बागवानी शब्द का मतलब अंग्रेजी में नर्स  या नर्सिंग होता है तथा इसका अर्थ, खेती-बाड़ी की भाषा में पौधे की देखभाल, पालन-पोषण और संरक्षण प्रदान करना होता है। पौधे को सबसे पहले नर्सरी में तैयार किया जाता है, जहां बीज की बुवाई तथा पौधे की देखभाल होती है। सामान्य तौर पर व्यवसायिक नर्सरी में फल, फूल, सब्जी जैसे अनेक पौधे तैयार किए जाते हैं। नर्सरी में पौधा तैयार करने के लिए जैविक खाद और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है, जिसके कारण इसमें केमिकल्स की मात्रा बेहद कम होती है।

बागवानी पौधशाला स्थापित करने के लिए किसी ऐसे स्थान का चयन करना चाहिए जहां पर्याप्त मात्रा में सूर्य का प्रकाश उपलब्ध होता है, सिंचाई की सुविधाएं तथा पानी के निकास की अच्छी व्यवस्था उपलब्ध होती है। स्थान का चयन विशेष रूप से मायने रखता है क्योंकि स्थान का चयन सही नहीं हुआ तो बागवानी खेती सफल नहीं होगी।

बागवानी करने के लिए एक ऐसी भूमि का चयन भी जरूरी है जिसका पीएच (pH) 6 से 7.30 के बीच में हो। अधिक सूखी या ज्यादा चिकनी भूमि में वायु संचार की कमी के कारण पौधों की वृद्धि अच्छी नहीं होती इसलिए एक साफ-सुथरी और स्वच्छ भूमि का चयन बागवानी पौधशाला के लिए आवश्यक है। यदि मिट्टी में दीमक की समस्या है तो उसे भी जैविक खाद द्वारा ही ठीक किया जाता है तथा शुष्क क्षेत्र में जहां सूर्य का प्रकाश बहुत तेज और गर्मियों में तापमान अधिक रहता है उस जगह मिट्टी का वर्गीकरण किया जाता है जिससे मिट्टी बारीक हो जाती है और पौधारोपण के लिए बढ़िया हो जाती है।

पौधों के शुरुआत के दिनों में उन्हें गमलों में रखा जाता है, जो विभिन्न आकार और माप के होते हैं। आमतौर पर मिट्टी के गमलों का सबसे ज्यादा उपयोग होता है, परंतु बाजार में सीमेंट और प्लास्टिक के भी गमले उपलब्ध है, जिनका उपयोग होता है। शुरुआती दिनों में पौधे का ख्याल रखना बेहद जरूरी है नहीं तो वे सूख जाएंगे।

ग्रीष्म ऋतु में यदि पत्ते मुरझाने लगे या ज्यादा प्रकाश के कारण पत्ते पीले हो जाए तो आपको पौधों पर नियमित पानी का छिड़काव करना पड़ेगा तथा सूर्य के प्रकाश की व्यवस्था को नियंत्रित करना पड़ेगा। बागवानी खेती हेतु, सुविधा अनुसार विभिन्न आकार के ग्रीनहाउस बनाए जाते हैं। ग्रीनहाउस में प्रकाश की व्यवस्था, सिंचाई के पानी की व्यवस्था तथा अन्य परिस्थितियों को पौधों के अनुकूल बनाया जाता है।

यह तो रही बागवानी खेती की बात। आइए, कुछ उदाहरण देखते हैं, जिससे पता चलता है कि बागवानी खेती कितनी फायदेमंद है।

यह उदाहरण हरियाणा के गांव दहमान के किसान फूल कुमार दहिया का है, जिन्होंने पारंपरिक खेती करते हुए लगभग 5 से 7 लाख का घाटा उठाया, परंतु अब नई तकनीक सीखते हुए तथा बागवानी और नर्सरी से हर साल लगभग 10 लाख रुपए कमा रहे हैं।

फूल कुमार ने शुरुआती दिनों में अपने 12 एकड़ जमीन पर पारंपरिक तरीके से गेहूं, धान और अन्य फसलों की खेती की, जिसमें उन्हें भारी घाटा हुआ। उन्होंने सरकार के प्रशिक्षण केंद्र में जाकर बागवानी और नर्सरी खेती के बारे में जाना और बागवानी करने का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। उसके बाद, उन्होंने नर्सरी फार्म शुरू किया और अपने बाग में उन्होंने लगभग 5 से 6 किस्म के पौधे लगाए जैसे; हिसार सफेदा अमरूद, पेमली बेर, आलू बुखारा, आदि। फूल कुमार ने बताया कि परंपरागत खेती में खर्चा ज्यादा और मुनाफा कम होने के कारण घाटा होता था, परंतु बागवानी में खर्चा कम और मुनाफा ज्यादा है।

बागवानी खेती से लाखों का मुनाफा कमाकर, फूल कुमार ने अपने अन्य किसान भाइयों के लिए एक मिसाल पेश किया है। फूल कुमार खेती के साथ-साथ लोगों को रोजगार देने में भी सहायक बन रहे हैं क्योंकि उनके नर्सरी पर उन्होंने 15 लोगों को रोजगार पर रखा है, जो उनकी बागवानी में मदद करते हैं। उनकी कड़ी परिश्रम और मेहनत का यह नतीजा था कि 2019 में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड ने उनके बाग को पंजीकृत कर मान्यता प्रदान की।

जो किसान भाई पारंपरिक खेती कर, घाटा उठा रहे हैं, उन्हें एक बार बागवानी खेती अवश्य करनी चाहिए।

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