गोबर से लकड़ी बनाने वाली मशीन बनाकर सरदार सुखदेव सिंह बने किसानों के मददगार

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ जिले का मवाना शहर यूं तो एक छोटा शहर है इस शहर के अधिकांश लोग कृषि और उससे संबंधित उद्योगों से जुड़े हुए हैं। यह शहर मवाना चीनी मिल मे बनने वाली चीनी की मिठास के लिए जाना जाता है। इसी शहर में  रहने वाले 67 वर्षीय कृषि उपकरणों के विक्रेता और निर्माता सरदार सुखदेव सिंह गोबर से लकड़ी बनाने वाली मशीन का निर्माण के लिए किसानों के बीच सुर्खियां बटोर रहे हैं। सुखदेव सिंह जी ने पंजाब एग्रो इंडस्ट्रीज नाम से मवाना में कृषि उपकरण बनाने की फैक्टरी चलाते हैं जहां कल्टीवेटर, रोटावेटर, थ्रैशर, गन्ना बोने की मशीन प्रणाली आदि कृषि उपकरणों का निर्माण और बेचने का काम करते हैं।

सुखदेव सिंह जी की खेती से जुड़े यंत्रों की तकनीकी मे विशेष जुड़ाव है। उनका मानना है कि किसी मशीन यंत्र को बनाने के लिये इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना जरूरी नहीं है यदि किसी मशीन या यंत्र से लोगों को फायदा हो रहा है तो थोड़े रिसर्च के माध्यम से उसे बनाया जा सकता है।

सुखदेव सिंह जी कृषि यंत्रों के निर्माण से जुड़े हुए हैं वे बताते हैं कि उनकी नजर इस क्षेत्र में होने वाले नये आविष्कार और खोजों पर बनी रहती है।  ऐसे में एक बार उन्हे यू ट्यूब पर गोबर से लकड़ी बनाने वाली मशीन के बारे में पता चला। वे इस मशीन से प्रभावित हुए और उसे बनाने की ठान ली। उनका मानना था कि इसके माध्यम से पेड़ो को कटने से बचाने जैसा नेक काम भी होगा साथ ही कचरा प्रबंधन भी हो सकेगा। इसके लिए उनके पास इरादा तो था लेकिन मशीन कैसे बनें यह एक दुष्कर कार्य था उन्होंने नेट पर से जानकारी इकट्ठा की, और अपने अनुभव से मशीन का निर्माण कर दिया। शुरुआत में मशीन में गियर बाक्स नही था उन्होंने लोगों को मशीन दिखाई और प्रयोग करने के बाद उसमें बहुत से और जरूरी बदलाव किये जिसे मशीन का एक उन्नत माडल बनकर तैयार हो गया। इस माडल में उन्नत गियर बाॅक्स के साथ पाँच हार्स पावर की मोटर भी लगी हुई है।

गोबर से लकड़ी बनाने की प्रक्रिया समझाते हुए श्री सुखदेव सिंह जी बताते हैं कि पहले जानवरों के गोबर को पाँच दिनों तक धूप में सूखाया जाता है इस कार्य मे गोबर गैस संयत्र से निकलने वाले अवशेष और पुआल के अवशेष का भी प्रयोग किया जा सकता है। धूप में सूखा लेने से गोबर का पानी निकल जाता है। मशीन मे डालने पर वह मिट्टी की तरह ढीला होना चाहिए। मशीन के इनलेट में सूखा गोबर और पुआल के अवशेष डालने पर दूसरी ओर से बेलन की तरह तीन फीट की लकड़ी निकल आती है। जिन्हें धूप में सुखाकर काम मे लाया जा सकता है। जिन्हें खाना बनाने, शमशान में शवों को जलाने आदि में कार्यों में लाया जा सकता है। यह जलती भी अच्छी तरह से है क्योंकि इसके बीच में एक छेद होता है। यह मशीन स्क्रू मैकेनिज्म पर काम करती है।

अपनी मशीन की उपयोगिता बताते सुखदेव सिंह कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में आज भी आबादी का बड़ा हिस्सा जलावन के लिए लकड़ियो पर निर्भर हैं। हम पशुपालन करने वाले किसानों को आय का एक स्रोत उपलब्ध करा रहे हैं। इसके साथ ही ग्रामीण औरत को भी उपले बनाने के काम से मुक्ति मिल रही है। इस मशीन से बने हुए उपले आसानी से आग पकड़ लेते हैं,और धुआँ भी कम उत्पन्न करते हैं। सिंह बताते हैं कि जीएसटी मिलाकर इस मशीन की कीमत 80000 बैठती है। किसान इससे हर महीने बड़े आराम से 8से10 हजार रुपये की कमाई बड़ी आसानी से कर सकता है । एक साल में ही लागत वसूल हो जाती है। साथ ही गोबर का समुचित प्रबंधन हो जाता है।

मेरठ के रहने वाले एक किसान मोहम्मद गुलफाम ने सुखदेव सिंह जी से पांच महीने पहले यह मशीन खरीद कर लाए हैं अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि मेरे पास 23 भैंसे और 7 गायें हैं जो प्रतिदिन एक कुंटल से ज्यादा गोबर करते हैं जिसका प्रबंधन करना हमारे लिए मुश्किल काम था जिसे इस मशीन ने आसान और फायदे में तब्दील कर दिया है। गोबर से बनने वाली लकड़ी खेत से ही बिक जाती है। जिससे हर महीने 8400 रूपए तक मिल जाते हैं। सुखदेव सिंह जी जैसे लोग अपने कौशल से खेती और पशुपालन जैसे परंपरागत व्यवसाय में नये बदलाव ला रहे हैं। जिससे नयी पीढ़ी भी कृषि और इससे जुड़े उद्योगों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। микрозайм онлайн


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