'फॉरेस्ट मैन ऑफ़ इंडिया' जादव पायेंग, जिसने जंगल के नाम कर दिया जीवन

आज का यह लेख उस महान व्यक्तित्व के लिए है जिसने साबित किया है कि दृढ़ता से बड़ा कोई अस्त्र नहीं होता। एक ऐसा व्यक्ति जिसके बारे शायद हम सभी ने कभी न कभी सुना ज़रूर होगा, एक ऐसा व्यक्ति जिसने शायद इस वसुंधरा का ऋण अवश्य चुका दिया है। एक व्यक्ति जिसने अकेले ही अपने दम पर एक वन व उसमे पनपने वाला जीवन बसा दिया है।

भारत के एक ग्रामीण गांव में रहने वाले साधारण से मनुष्य ने बिना किसी की सहायता से 1,360 एकड़ / 550 हेक्टेयर के क्षेत्र-फल में वन्यजीवन बसा दिया। हम बात कर रहे है असम के जोरहाट जिले में रहने वाले जादव मोलाई पायेंग की। जादव पायेंग को भारत के ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ़ इंडिया ‘ के रूप में बेहतर जाना जाता है। उन्होंने अपने जीवन के तकरीबन 30 साल पेड़ लगाकर, एक वास्तविक मानव निर्मित जंगल बनाते हुए यह नाम कमाया है । इस पुनर्विकास की वजह से वन्यजीव क्षेत्र में पुनः लौट आया हैं। अविश्वसनीय रूप से, उन्होंने यह सब अपने आप से किया है । यह उनकी ही कहानी है जिनके नाम पर एक जंगल का नाम रखा गया है, जो है ‘मोलाई’ वन।

दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप माजुली है। मोलाई अभ्यारण्य भारत के असम में जोरहाट जिले में कोकिलामुख के पास ब्रह्मपुत्र नदी में माजुली द्वीप पर एक जंगल है और इसके तट व्यापक मिट्टी के कटाव के कारण निरंतर खतरे में है। माजुली पिछले 70 वर्षों में आधे से अधिक सिकुड़ गया है। चिंताएं हैं कि यह अगले 20 वर्षों के भीतर जलमग्न हो सकता है।

जादव पायेंग की इस मुहीम की शुरुआत एक तबाही से शुरू हुई थी। असम में 1979 के दौरान भयंकर बाढ़ आई थी, तब उनकी उम्र तकरीबन मात्र 14 वर्ष थी। ब्रह्मपुत्र नदी में आयी बढ़ के कारण किनारे पर रहने वाले कई जानवरो की मृत्यु हो गयी, सैकड़ों की संख्या में मरे हुए सांप रेत पर आ गए थे और भूमि कटाव के कारण आस पास की हरियाली, भूमि, जंगल सब नदी में समा गया था।

हरियाली और जंगलो के नष्ट होते ही वहां के पशु पक्षियों का बसेरा भी छिन गया था। इस घटना ने जादव के मन को झंझोर के रख दिया, वह बतलाते है कि-

‘मुझे लगा कि एक दिन हम इंसानों की दशा भी ऐसी हो सकती है’

इस घटना के बाद वह गांव के बड़े-बूढ़ो से जा कर मिले और समस्या बतायी। उन्होंने जादव पायेंग को बताया की सिर्फ वृक्षारोपण से ही यह समस्या सुधर सकती है। उन्होंने तत्काल वहां पेड़-पौधे लगाने शुरू कर दिया।

शुरुआत तकरीबन मात्र 20 बांस से के पौधों से हुई थी। उस वक़्त जादव पायेंग दसवीं कक्षा में थे, उन्होंने इसके बाद पढाई छोड़ दी थी, उनका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ उस बंजर पड़ी ज़मीन को हरियाली से भरना था। कहते है न की ‘किसी काम की शुरुआत से ही उसकी नियति तय हो जाती है ‘, और अपने कई वर्षो के अथक प्रयासों के बाद उन्होंने वहां एक वन खड़ा कर दिया। शुरुआत में उन्होंने सिर्फ बांस उगाया फिर अलग अलग प्रकार के पेड़ पौधे उगाने लगे।

अब कई जगहों से पशु-पक्षी यहाँ वापस आने लगे थे। यह सब देख कर जादव पायेंग काफी खुश हुए, उन्हें अपना सपना, अपने कई वर्षो की मेहनत सफल होती नज़र आने लगी। उनका सैदव यह मानना रहा है की वह जगह उनकी नहीं है बल्कि उन सब वन्यजीवों की है जिनसे इंसान ने अपने स्वार्थ हेतु वह जगह छीन ली थी । वह बतलाते है की पहले जंगल का विस्तार करना मुश्किल था पर अब उतना मुश्किल नहीं रहा था, क्योंकि प्रकृति ने अपना काम स्वयं करना शुरू कर दिया था। जंगल अब इतना घना हो गया था की वहां हाथियों का झुंड तकरीबन साल के 3 महीने, वही गुज़ारता था।

हाथियों के साथ वहां मुख्य रूप से गेंडे, हिरन, बाघ व गिद्ध जो तकरीबन 40 सालो बाद वहां दिखने लगे थे। चूँकि अब पेड़ बड़े हो चुके थे तो खतरा भी उसे इंसानो से होने लगा था। वह जानते थे कि शिकारियों की नज़र उनके जंगल और वहां के वन्यजीवों पर ज़रूर पड़ेगी, यही वजह है कि हर बार जब उन्हें कहीं यात्रा करनी होती है, तो वह स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों से निवेदन करते है कि वह उस वन पर नज़र रखे।

इस बीच एक वाक्या हुआ जिनसे उनका प्रकृति के प्रति अपार प्रेम झलकता है। हुआ कुछ यूं की जब हाथियों ने वहां आना शुरू किया तो कई बार उन्होंने गाँव में उत्पात मचाया और ग्रामीणों के घरों को नष्ट कर दिए । ग्रामीणों ने हजारों की संख्या में उनसे शिकायत की कि “आपने जंगलों को उगाया और अब हाथी हमारे घरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।” तो उन्होंने कहा, “हाथी एक विषय है और पेड़ दूसरे। मेरे पेड़ आपके घरों को नहीं तोड़ते हैं। अगर आप चाहते हैं कि हाथी के बारे में शिकायत हो तो वन विभाग, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री से जा कर करें, उनसे पूछें। यह घटना उनकी निर्भीकता को दिखलाती है।

जादव का यह कार्य पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बहुत बड़ी पहल है, पर इस विषय पर देश को और विश्व को काफी समय बात ज्ञात हुआ। एक बार जोरहाट स्थित स्वतंत्र पत्रकार और वन्यजीव फोटोग्राफर जीतू कालिता उनके बारे में पूछते हुए वहां पहुंचे लेकिन जादव पायेंग को उन पर शक था। जादव पायेंग ने शुरुआत में जीतू कालिता को शिकारी समझा, और उन्हें वहां से जाने को कह दिया। लेकिन जीतू कालिता अन्य लोगों के साथ सात दिनों के बाद फिर आए और जादव पायेंग को बताया कि उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है और उन्हें इनाम स्वरुप 500 रुपये और एक प्रमाण पत्र भी दिया। इसके बाद जीतू कालिता ने जादव पायेंग के ऊपर स्थानीय अखबार में एक लेख लिखा।

जादव पायेंग मानते है की इस लेख ने उनके जीवन को बदल कर रख दिया। इसके बाद DY365 टीवी चैनल और दिल्ली से टाइम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्टर आए। टाइम्स ऑफ इंडिया में जादव पायेंग के बारे में प्रकाशित होने के बाद उन्हें ‘पृथ्वी दिवस’ के उपलक्ष्य में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में आमंत्रित किया गया और वहां उन्होंने जादव पायेंग को ‘फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया’ के रूप में सम्मानित किया।

उसके बाद उन्हें मुंबई में भारत के पूर्व राष्ट्रपति व स्वर्गीय श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा शनमुखानंद संगीत सभा की हीरक जयंती में सम्मानित किया गया। उसके बाद जादव पायेंग को पेरिस में एक कार्यक्रम (फ्रांस के एवियन में ‘इंटरनेशनल फोरम फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट’) के लिए आमंत्रित किया गया था जिसमें 200 देशो के तकरीबन 900 प्रतिनिधि शामिल थे। 2015 में, उन्हें पूर्व राष्ट्रपति आदरणीय श्री प्रणब मुखर्जी जी द्वारा, भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

 

जादव पायेंग ने सदैव यह कहा है की अगर हमें पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार लाना है तो केवल एक ही तरीका है, वृक्षारोपण। वह बताते है कि उनके जंगल के जानवर उनकी मदद करते हैं। पक्षी पेड़ लगाना जानते हैं, हिरण पेड़ लगाना जानते हैं, हाथी पेड़ लगाना जानते हैं, परन्तु आदमी केवल काटना जानता है, वे पौधे लगाना नहीं जानते। वह कहते है की मानव की भूख इतनी बढ़ गयी है की वह सब कुछ खत्म कर देगा फिर भी उसकी भूख कभी शांत नहीं हो पायेगी। अगर प्रकृति में कोई राक्षस है तो वो सिर्फ इंसान ने जिसकी भोगने की अभिलाषा एक दिन पर्यावरण खत्म कर देगी। विडम्बना तो यह है कि हम सब इसके विषय में जानते है पर हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते है। एक शुरुआत की ज़रुरत है जो इस विश्व को जादव पायेंग ने दे दी है अब हमारी बारी है, जब एक व्यक्ति इतना कर सकता तो हम सब क्यूं नहीं, एकता में तो वैसे भी अधिक शक्ति होती है ना। सच में हम सभी को आत्ममंथन की आवश्यकता है। payday loan


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