फल की चिंता करे बिना नित्य ही अपने काम में मगन रहें

काम करते वक़्त अगर आप चिंताओं से ग्रस्त है, हर वक़्त सोचते रहते है की आगे कुछ बुरा न हो जाये, तो आप सदैव ही परेशान रहेंगे। अगर काम आपको बोझ प्रतीत होता है, तो उसे इंसान पूर्ण निष्ठा से नहीं कर सकता। चिंताओं से मुक्त होकर, प्रसन्नचित्त होकर, बोझ नहीं कर्त्तव्य समझकर कार्य करने से उसकी सफलता कि सम्भावनाये बढ़ जाती है।

चलिए एक लोककथा के माध्यम से समझने का प्रयास करे

पुराने समय में एक राजा थे, उन्हें राज करते कई वर्ष हो चुके थे, अभी तक सब ठीक चल रहा था। एक वर्ष उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा। हर तरफ त्राहि – त्राहि मच गयी। स्थिति से निपटने के लिए राजा ने राजकीय कोष के द्वार खोल दिए। लोगो के पास अपना गुज़ारा करने के लिए तो संसाधन थे नहीं, तो आगे का लगान कहां से देते। इस बार लगान न आने की वजह से राजकोष पर भारी असर पड़ा, लगभग वह रिक्त हो गया था। राजा को चिंता होने लगी, की राजकीय खर्च कैसे काम करा जा सकता है, कैसे दोबारा कोष को सामान्य किया जाये, अगर अगले वर्ष भी अकाल पड़ गया तो स्थिति सँभालने योग्य संसाधन ही नहीं रहेंगे ,उसे यह भी आशंका रहने लगी थी कि कहीं शत्रु राज्य पर आक्रमण न कर दे।

इन सभी चिंताओं से ग्रसित हो कर वह नित्य ही परेशान रहने लगा। उसका किसी कार्य में मन नहीं लगता था, नींद गायब हो गयी थी, भूख प्यास भी कम हो चुकी थी। एक दिन वह अपने बगीचे के माली को देखता है कि किस प्रकार वह प्रसन्नता के साथ रोटी, चटनी, और प्याज खा रहा है। उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि किस प्रकार मेरे समक्ष नाना तरह के शाही व्यंजन होते है फिर भी मैं सुकून से खाना नहीं खा पता, और यह माली सुखी रोटी बड़े चाव और सुकून के साथ खा रहा है।

यह बात जब राजा के गुरु को पता लगी तो उन्होंने राजा से पूछा ” हे राजन् ! आपको क्या लगता है, वह माली इतनी निश्चिंतता के साथ कैसे खा रहा है ?” राजा कहते है ” गुरुदेव ! मेरे हिसाब से चूँकि वह नौकरी कर रहा है, इसलिए उसे सिर्फ अपने काम से मतलब है बाकी किसी चीज़ की चिंता नहीं है उसे, इसलिए वह सुकून से है। काश ऐसा सुकून मेरे भी भाग्य में होता। ”

गुरुदेव उससे कहते है कि ” चलो आज मैं तुमसे गुरूदक्षिणा माँगना चाहता हूँ, दे पाओगे ?” राजा जवाब देता है ” अवश्य गुरुदेव, सब आपका ही है जो चाहे मांग लीजिये ”

गुरु कहते है कि “मैं तुमसे तुम्हारा यह राज्य मांगता हूँ, लेकिन में स्वयं तो आश्रम में ही रहूँगा, तो यहाँ का कार्यभार सँभालने के लिए तुम्हे नौकरी पर रखना चाहता हूँ” राजा ने पूरा राज्य अपने गुरु को सौप दिया और वहां का कार्यभार एक कर्मचारी के रूप में संभाल लिया। इसके बाद गुरु आश्रम की ओर चल दिए।

कुछ महीनो बाद गुरु वापस राज्य में आये, उनका खूब धूम धाम से स्वागत हुआ। समय पा कर गुरु ने राजा से पूछा “अब तुम्हारी निद्रा, भोजन चक्र, सुख, चैन, सुकून की दशा है ?”राजा ने बताया कि “अब वह काफी शांति से कार्य करता है, आपदा से निपटने के लिए उसकी बनायीं गयी सभी योजना सफल रही, कोष भी भरने लगा है, नींद व भूख भी पर्याप्त है। ”

गुरु ने राजा से कहा “आज भी स्थिति वैसी ही है, तुमने ही इस राज्य का कार्यभार संभाल रखा है बस फरक इतना है कि अब यह जिम्मेदारी तुम्हे बोझ नहीं लग रही है, तुम इसे अपना कर्त्तव्य समझ कर निभा रहे हो। जब भी मनुष्य अपने काम को कर्तव्य समझ कर, व बिना फल एवं परिणाम की चिंता करे नित्य ही अपने काम में मगन रहता है तो उसकी सफलता सम्भावनाये कई गुना बढ़ जाती है।” राजा, गुरु के दक्षिणा वाली बात अभिप्राय अब समझ पाया था। उसने गुरुदेव को नमन कर उनसे आशीर्वाद लिया। गुरु ने भी अब वह राज्य, राजा को पुनः वापस कर दिया। онлайн займ


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